नवरात्री का समय माता के भक्तों के लिए भक्ति, उमंग, उत्साह का होता है, नवरात्री के 9 दिन भक्तो माता की पूजा पाठ करके माता के प्रति अपनी आस्था एवं श्रद्धा से अनुष्ठान करते है। नवरात्री के नौ रातें माता भगवती के 9 रूपों की पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्री पूजा के 9 दिन बेहद खास होते है इसलिए जो भक्त विधि विधान से माँ की आराधना करता है माँ उसके सभी दुखों को हर लेती है | भारतीय कैलेण्डर के अनुसार नवरात्री-२०२३ में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ महीने में आती है | इन 4 नवरात्री पूजा में से चैत्र और आश्विन नवरात्री पूजा मुख्य रूप से की जाती है | आश्विन नवरात्री 15 अक्टूबर को शुरू होती है और 24 अक्टूबर को समाप्त होती है

नवरात्री पूजा के लिए सामग्री

देवी की प्रतिमा या फोटोफूलसिंदूरजायफल
लाल चुनरीपानरोलीजावित्री
लाल वस्त्रसुपारीकपूरकमलगट्टा
मौलीलौंगधूपनैवेद्य
दीपकइलायचीलाल पुष्प या पुष्पहारबताशा
घी/तेलबताशे या मिसरीसुपारी साबुतमध
धूपकपूरहल्दी की गांठ पटराशक्कर
नारियलफल-मिठाईआसनगंगाजल
साफ चावलकलावाचौकीमिट्टी के बर्तन में ज्वारा 
कुमकुमशंखपंचमेवाकलश

नवरात्रि-2023 में घटस्थापना मुहूर्त

नवरात्रि-२०२३ के अवसर पर, घटस्थापना का शुभ समय 14 अक्टूबर को रात 11:24 बजे से शुरू होगा और 16 अक्टूबर को दोपहर 12:32 बजे तक रहेगा। इस समय के दौरान घटस्थापना करना धार्मिक और सामाजिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यह समय भगवती दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त इस समय में घटस्थापना करके मां दुर्गा की पूजा और आराधना करते हैं ताकि उन्हें खुशियों और समृद्धि की प्राप्ति हो सके।

इस धार्मिक अवसर पर, घरों में भगवती दुर्गा की मूर्ति या चित्र को सजाकर रखा जाता है, और पूजन एवं आराधना का आयोजन किया जाता है। यह समय भक्तों के लिए आत्मिक ऊर्जा और शक्ति का संचार करने का भी अद्वितीय अवसर है। घटस्थापना मुहूर्त का पालन करके विशेष रूप से इस अद्भुत अवसर पर भगवती की कृपा और आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। इसलिए, अपने परिवार और प्रियजनों के साथ इस पवित्र अवसर का सम्मान करें और भगवती दुर्गा की कृपा को प्राप्त करें।

नवरात्री पर घटस्थापना और माता की स्थापना विधि

  • पूजा स्थल को सफा करें और उसे सुखद धूप और गंगा जल से शुद्ध करें।
  • कलश को तैयार करें: कलश को पूर्ण घट के रूप में उपयोग करें। उसमें गंगा जल डालें, फिर उसमें चावल, नारियल, कलश की ऊपरी धक्कन, और फिर माला को बांधें।
  • कलश को पूजा स्थल पर स्थित करें, जिसे आप मां दुर्गा के आगे रखेंगे।
  • कपूर को दीपक में लिट और दीपक को जलाएं।
  • रोली को चोटी पर लगाएं और ब्रज के लिए तैयार करें।
  • मां दुर्गा की मूर्ति को स्थापित करें और उसे पूजा करें। आप उसे फूल, फल, और मिश्री से चढ़ा सकते हैं।
  • पूजा के दौरान, धूप और दीपक को मां दुर्गा की ओर ले जाकर पूजें।
  • मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ मन्त्र जाप करें, जैसे कि “ॐ दुर्गायै नमः” या अन्य मां दुर्गा के मन्त्र।
  • पूजा के बाद, फल और मिश्री का भोग मां दुर्गा को अर्पित करें।

नवरात्री की पूजन विधि

नवरात्रि पर मां की पूजा करने से आशीर्वाद मिलता है। हर राज्य में नवरात्रि का विशेष महत्व होता है। हर राज्य में नवरात्रि पूजा के रीति-रिवाज अलग-अलग होते हैं, इस ब्लॉग में आपको पारंपरिक पूजा प्रक्रिया समझाई जाएगी।

आइए जानते हैं कैसे करें नवरात्रि की पूजा

  • हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार किसी भी पूजा की शुरुआत अग्निदेव से होती है। इसलिए दीपक जलाकर नवरात्रि पूजा की शुरुआत करें।
  • हमारे हिन्दू रीतिरिवाज के अनुसार कोय भी पूजा हवन से पहले भगवान गणेश की पूजा और आह्वान किया जाता है। इसलिए भगवान गणेश को रोली से तिलक लगाएं और मौली अर्पित कर उनका पूजन करें | 
  • इसके बाद देवी माता का आह्वान करते हुए शुद्ध जल से जलाभिषेक करें, फिर पंचामृत से अभिषेक करें, फिर एक बार फिर शुद्ध जल से अभिषेक करें और माता की मूर्ति को शुद्ध करें।
  • माता को मोली रूपी वस्त्र अर्पित करें। (माता की मूर्ति पर मोली चढ़ाएं)
  • माता को  कंकु का तिलक लगाएं।
  • माता को ताजा पुष्प अर्पित करें और सुगन्धित पुष्प माला पहनाएं | 
  • बाद में घर मे बनाये गए नैवेद्य अर्पित करें |
  • इसके बाद माता के आगे धूप और दीपक जलाएं | और माता को नमन करें , और पूजा में यदि कोई गलती हुई हो तो उसके लिए क्षमा याचना प्रार्थना करें |
  • अब सभी परिवारजन सहित माता की आरती गाएं |
  • माता को घर में बने व्यंजनों का भोग लगाएं और प्रसाद बाँटें।
  • नवरात्री के 9 दिन तक इसी प्रकार पूजन करें,  और ९ वे दिन माता के भोग लगाएं और 10 साल से कम उम्र की 9 कन्याओं को भोजन करवाएं और कन्याओं के पैर धोएं और उन्हें दक्षिणा प्रदान करेंके नवरात्री के पवित्र त्यौहार को मनाये |

नवरात्रि के पहले दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 15 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल प्रतिपदा 

अधिस्ठात्री देवी – माँ शैलपुत्री 

माँ शैलपुत्री का मंत्र – 

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम | 

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम ||

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के पहले दिन को प्रथमा तिथि (Pratipada) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। माता शैलपुत्री को दुर्गा देवी का प्राथमिक स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है। यह पूजा और कथा निम्नलिखित रूप में की जाती है:

नवरात्रि के पहले दिन की पूजा

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, अपने पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से ताम्र पात्र में पानी और अपने प्रिय पुष्पों को रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता शैलपुत्री की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए वस्त्र, माला, चन्दन, कुमकुम, और बिल्व पत्र की अर्चना करें।
  • माता की पूजा के दौरान उनका १०८ नाम सुनाएं और मंत्रों का जाप करें, जैसे “या देवी शैलपुत्र्यै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (मिश्रित फल, मिठाई, और खिचड़ी) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, प्रार्थना करें कि माता शैलपुत्री आपके जीवन को सुखमय और समृद्धि से भर दें और आपके सभी कष्टों को दूर करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता के भव्य भोग का आनंद लें।

माता शैलपुत्री की कथा:

माता शैलपुत्री की कथा: माता शैलपुत्री की कथा के अनुसार, एक समय पर्वत राजा हिमावत और उनकी पत्नी मेना बिना संतान के थे। वे बहुत उदास थे और बच्चों की कामना करते थे।

एक दिन, मेना ने भगवान ब्रह्मा से यज्ञ करने का सुझाव दिया और उन्होंने उसे आयोजित किया। इस यज्ञ में वे अपनी पत्नी के साथ सम्पूर्ण श्रद्धा और भक्ति से व्रत और पूजा करते थे।

यज्ञ के अंत में, भगवान ब्रह्मा ने देवी पार्वती को प्रकट होने के लिए कहा और वे शैलपुत्री के रूप में प्रकट हुईं। इसके बाद, उन्होंने पार्वती के रूप में पर्वत राजा की कन्या बनकर उनके घर में आकर विराजमान हो गईं। उसके बाद, उन्होंने अपनी तपस्या और भक्ति से माता पार्वती की कृपा प्राप्त की और उन्हें शैलपुत्री के रूप में पूजा और भगवान शिव से विवाह का आग्रह किया।

इस प्रकार, पर्वत राजा और मेना का ब्रत्यक्ष करने का फल स्वरूप में, माता शैलपुत्री ने अपने भक्तों की मांग पूरी की और वे सुखमय और समृद्धि से भरे जीवन की प्राप्ति की। इसलिए, नवरात्रि के पहले दिन को माता शैलपुत्री की पूजा करके भक्त उनकी कृपा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नवरात्री के दूसरे दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 16 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल द्वितीया 

अधिस्ठात्री – माँ ब्रह्मचारिणी 

माँ ब्रह्मचारिणी का मंत्र – 

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू | 

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचरणयनुत्तमा || 

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त-

नवरात्रि के दूसरे दिन को द्वितीया तिथि (Dwitiya) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। माता ब्रह्मचारिणी को दुर्गा का दूसरा स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की तपस्या और पारम्परिक ब्रह्मचर्य के लिए किया जाता है। यहां पर नवरात्रि के दूसरे दिन की पूजा और कथा दी गई है:

नवरात्रि के दूसरे दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, अपने पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से कटोरे में पानी और दूध को मिलाकर रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता ब्रह्मचारिणी की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए वस्त्र, माला, चन्दन, कुमकुम, और कटिया आदि की अर्चना करें।
  • माता की पूजा के दौरान, उनके १०८ नामों का जाप करें और मंत्रों का पाठ करें, जैसे “या देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (दूध और फल) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, माता ब्रह्मचारिणी से आपके जीवन में आत्मा-शुद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता के भव्य भोग का आनंद लें।

माता ब्रह्मचारिणी की कथा:

माता ब्रह्मचारिणी की कथा के अनुसार, वे प्राचीन काल में अत्यंत तपस्या करने वाली ऋषिकुमारी थीं। उन्होंने अपने जीवन को आत्मा-शुद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान के लिए समर्पित किया था।

माता ब्रह्मचारिणी के नाम का अर्थ होता है “ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली” और उन्होंने अपने जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन किया था, जिससे वे अत्यंत आत्मा-शुद्धि प्राप्त कर सकें। वे एक पतिव्रता और अत्यंत ध्यानशील थीं और उनकी तपस्या और परम व्रत के कारण ही वे माता ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध हुईं।

नवरात्रि के इस दिन का व्रत भक्तों को आत्मा के शुद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित करता है और माता ब्रह्मचारिणी की कृपा प्राप्ति की प्रार्थना करता है।

नवरात्री के तीसरे दिन की पूजा और कथा

दिनांक –  17 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल तृतीया 

अधिस्ठात्री देवी – चन्द्रघण्टा 

मन्त्र – 

पिंडज प्रवरारूढा चैंकोपास्त्रकैर्युता | 

प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता || 

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के तीसरे दिन को तृतीया तिथि (Tritiya) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। माता चंद्रघंटा को दुर्गा का तीसरा स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की शांति और समृद्धि के लिए किया जाता है। यहाँ नवरात्रि के तीसरे दिन की पूजा और कथा दी गई है:

नवरात्रि के तीसरे दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से पात्र में पानी और जल को रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता चंद्रघंटा की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए वस्त्र, माला, चन्दन, कुमकुम, और कटोरा आदि की अर्चना करें।
  • माता की पूजा के दौरान, उनके १०८ नामों का जाप करें और मंत्रों का पाठ करें, जैसे “या देवी चंद्रघंटायै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (चावल, दूध की मिठाई, और फल) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, माता चंद्रघंटा से आपके जीवन में शांति, समृद्धि, और सफलता की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता की कृपा और आशीर्वाद का आनंद लें।

माता चंद्रघंटा की कथा:

माता चंद्रघंटा की कथा के अनुसार, वे एक बार पृथ्वी पर अवतरित हुईं और विवासित होकर अपनी तपस्या और उपासना में लीन रहीं। उनकी छवि चांद के समान सुंदर थी, और उन्होंने अपनी शक्ति और प्रेरणा से भरी शांति और समृद्धि का संकेत किया।

माता चंद्रघंटा का वाहन कुँवर या शेर था, जो उनकी शक्ति और वीरता का प्रतीक था। उनकी भक्तों द्वारा की जाने वाली पूजा और उपासना से उनकी कृपा मिली और उन्होंने अपने भक्तों को आत्मा की शांति, समृद्धि, और सफलता की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद दिया।

नवरात्रि के तीसरे दिन का व्रत माता चंद्रघंटा की पूजा और उपासना के माध्यम से भगवान की कृपा की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस दिन की पूजा से भक्त अपने जीवन में खुशियों, समृद्धि, और शांति की प्राप्ति कर सकते हैं।

नवरात्रि के चौथे दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 18 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल चतुर्थी 

देवी – माँ कूष्माण्डा 

मन्त्र – 

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च | 

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तुमे || 

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के चौथे दिन को चतुर्थी तिथि (Chaturthi) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता कुष्माण्डा की पूजा की जाती है। माता कुष्माण्डा को दुर्गा का चौथा स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की आशीर्वाद, सुरक्षा, और समृद्धि के लिए किया जाता है। यहाँ नवरात्रि के चौथे दिन की पूजा और कथा दी गई है:

नवरात्रि के चौथे दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से पात्र में पानी और कन्या के लिए पुष्प स्वरूप फल रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता कुष्माण्डा की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए वस्त्र, माला, चन्दन, कुमकुम, और कन्या के लिए सुखमय जीवन की कामना करते हुए पुष्प स्वरूप फल की अर्चना करें।
  • माता कुष्माण्डा की पूजा के दौरान, उनके १०८ नामों का जाप करें और मंत्रों का पाठ करें, जैसे “या देवी कुष्माण्डायै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (फल, मिठाई, और खिचड़ी) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, माता कुष्माण्डा से आपके जीवन में आनंद, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता कुष्माण्डा की कृपा और आशीर्वाद का आनंद लें।

माता कुष्माण्डा की कथा:

माता कुष्माण्डा की कथा के अनुसार, वे एक प्राचीन देवी थीं जो महाकाल की शक्ति से उत्पन्न हुई थीं। उन्होंने अपनी तपस्या, साधना, और प्रेरणा से जगह-जगह के अशुभ संकेतों का समापन किया और विश्व की सृष्टि की रचना की।

कुष्माण्डा का नाम ‘कुष्म’ और ‘आण्ड’ के शब्द से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ‘ब्रह्मांड का अंडा’। उन्होंने ब्रह्मांड की रचना की और उसे अपने भक्तों के लिए सुरक्षित रखा। माता कुष्माण्डा की पूजा से भक्त उनकी कृपा, सुरक्षा, और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नवरात्रि के पांचवे दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 19 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल पंचमी 

देवी – माँ स्कंदमाता 

मन्त्र – 

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्व्या | 

शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी || 

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के पांचवे दिन को पंचमी तिथि (Panchami) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता स्कंदमाता की पूजा की जाती है। माता स्कंदमाता को दुर्गा का पांचवा स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की प्रसन्नता, समृद्धि, और शांति के लिए किया जाता है। यहाँ नवरात्रि के पांचवे दिन की पूजा और कथा दी गई है:

नवरात्रि के पांचवे दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से पात्र में पानी और दूध को मिलाकर रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता स्कंदमाता की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए वस्त्र, माला, चन्दन, कुमकुम, और सुखमय जीवन की कामना करते हुए पुष्प स्वरूप फल की अर्चना करें।
  • माता की पूजा के दौरान, उनके १०८ नामों का जाप करें और मंत्रों का पाठ करें, जैसे “या देवी स्कंदमात्रायै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (दूध, मिठाई, और फल) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, माता स्कंदमाता से आपके जीवन में प्रसन्नता, समृद्धि, और आनंद की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता स्कंदमाता की कृपा और आशीर्वाद का आनंद लें।

माता स्कंदमाता की कथा: 

माता स्कंदमाता की कथा के अनुसार, वे माता पार्वती के रूप में प्रकट हुईं थीं। उन्होंने अपनी भक्तों को आनंद, सुख, और समृद्धि की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद दिया था। उनका नाम ‘स्कंदमाता’ है क्योंकि उनके पुत्र, स्कंद (कार्तिकेय) को उन्होंने जन्म दिया था। स्कंदमाता के आशीर्वाद से उनके भक्त जीवन में समृद्धि, सफलता, और सुख की प्राप्ति करते हैं। उन्होंने अपने भक्तों को आत्मा की शांति, समृद्धि, और सफलता की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया था।

नवरात्रि के छठे दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 20 अक्टूबर 2023  

तिथि – आश्विन शुक्ल षष्ठी 

देवी – माँ कात्यायनी 

मन्त्र – 

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शाईलवरवाहना | 

कात्यायनी शुभं दध्यादेवी दानवघातिनी || 

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के छठे दिन को षष्ठी तिथि (Shashthi) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता कात्यायनी की पूजा की जाती है। माता कात्यायनी को दुर्गा का छठा स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की कृपा, समृद्धि, और सुख-शांति के लिए किया जाता है। यहाँ नवरात्रि के छठे दिन की पूजा और कथा दी गई है:

नवरात्रि के छठे दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से पात्र में पानी और मधु को मिलाकर रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता कात्यायनी की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए वस्त्र, माला, चन्दन, कुमकुम, और भोग के रूप में मिठाई आदि की अर्चना करें।
  • माता की पूजा के दौरान, उनके १०८ नामों का जाप करें और मंत्रों का पाठ करें, जैसे “या देवी कात्यायन्यै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (मिठाई, फल, और खीर) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, माता कात्यायनी से आपके जीवन में सुख, समृद्धि, और शांति की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता कात्यायनी की कृपा और आशीर्वाद का आनंद लें।

माता कात्यायनी की कथा:

माता कात्यायनी की कथा के अनुसार, वे एक बार ब्रह्मा ऋषि के उपासना में निमग्न हो गईं। वह अत्यंत सात्त्विक स्वरूपी थीं और उनकी आकृति परिपूर्ण थी। उनकी तपस्या और साधना ने भगवान विष्णु को प्रसन्न किया, जिन्होंने उनसे शादी की और उन्हें अपनी पत्नी बनाया।

माता कात्यायनी की पूजा से भक्त उनकी कृपा, समृद्धि, और सुख-शांति की प्राप्ति कर सकते हैं। उन्होंने अपने भक्तों को आत्मा की शुद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान, और सात्त्विक गुणों की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया था।

नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 21 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल सप्तमी 

देवी – माँ कालरात्रि 

मंत्र 

एक वेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता | 

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी || 

वामपदहोलसल्लोहलताकण्टक भूषणा | 

वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के सातवें दिन को सप्तमी तिथि (Saptami) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता कालरात्रि की पूजा की जाती है। माता कालरात्रि को दुर्गा का सातवाँ स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की शक्ति, संक्षिप्तता, और संयम की प्रतीक्षा में किया जाता है। यहाँ नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा और कथा दी गई है:

नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से पात्र में पानी और काली उदद की दाल को मिलाकर रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता कालरात्रि की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए काली उदद की दाल, माला, चन्दन, कुमकुम, और फल की अर्चना करें।
  • माता की पूजा के दौरान, उनके १०८ नामों का जाप करें और मंत्रों का पाठ करें, जैसे “या देवी कालरात्र्यै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (काली उदद की दाल, चावल, और गुड़) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, माता कालरात्रि से आपके जीवन में शक्ति, संक्षिप्तता, और संयम की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता कालरात्रि की कृपा और आशीर्वाद का आनंद लें।

माता कालरात्रि की कथा:

माता कालरात्रि की कथा के अनुसार, एक समय पार्वती देवी ने अपनी संक्षिप्त और विकराल स्वरूप में प्रकट होकर दुर्गा के रूप में जन्म लिया था। उनकी भयानक रूप में प्रकटि को देखकर उसके पिता, राजा हिमवान, भी घबराए। पार्वती देवी ने उसे शांति और साधना की शक्ति देने का व्रत किया था।

माता कालरात्रि की पूजा से भक्त उनकी शक्ति, संक्षिप्तता, और संयम की प्राप्ति करते हैं। उन्होंने अपने भक्तों को संसार में जीवन के संघर्षों का सामना करने की शक्ति प्रदान की है और उन्हें आत्मा की ऊँचाई की ओर ले जाने की प्रेरणा प्रदान की है। इस कथा से हमें यह सिखने को मिलता है कि जीवन के हर कठिनाई से निपटने के लिए संक्षिप्तता, संयम, और शक्ति की आवश्यकता होती है। माता कालरात्रि की पूजा न ही केवल भगवती की भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह हमें अपनी आत्मा की महत्वपूर्णता और उसकी ऊँचाई की ओर ले जाने का मार्ग दिखाती है।।

नवरात्रि के आठवें दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 22 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल सप्तमी 

देवी – माँ महागौरी 

मंत्र – 

श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः | 

महागौरी शुभं दधानमहादेवप्रमोददा || 

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के आठवें दिन को अष्टमी तिथि (Ashtami) के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है। माता महागौरी को दुर्गा का आठवां स्वरूप माना जाता है, और इस दिन का व्रत माता की प्रशांतता, पवित्रता, और निर्मलता के लिए किया जाता है। यहाँ नवरात्रि के आठवें दिन की पूजा और कथा दी गई है:

नवरात्रि के आठवें दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत करने से पहले, पूजा स्थल को शुद्ध करें और एक छोटे से पात्र में पानी और कन्या के लिए सोने की कड़ाई में पानी रखें।
  • पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश की पूजा करें और उन्हें आवाहन दें।
  • अब माता महागौरी की मूर्ति, तस्वीर, या प्रतिमा को सजाएं। उनकी पूजा के लिए वस्त्र, माला, चन्दन, कुमकुम, और सफेद फूलों की अर्चना करें।
  • माता की पूजा के दौरान, उनके १०८ नामों का जाप करें और मंत्रों का पाठ करें, जैसे “या देवी महागौर्यै नमः”।
  • माता के पास अर्चना के लिए पुष्प, दीपक, और नैवेद्य (मिठाई, फल, और सफेद चावल) अर्पित करें।
  • धूप और दीपक के साथ माता की आरती गाएं और उनके पास करें।
  • अंत में, माता महागौरी से आपके जीवन में शांति, पवित्रता, और सफ़ाई की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।
  • पूजा के बाद, प्रसाद बाँटें और अपने परिवार के सदस्यों के साथ माता महागौरी की कृपा और आशीर्वाद का आनंद लें।

माता महागौरी की कथा:

माता महागौरी की कथा के अनुसार, पार्वती देवी ने अपने आत्म-समर्पण और तपस्या से भगवान शिव को प्राप्त किया था। उन्होंने अपनी साधना और व्रतों से अत्यधिक प्रशांतता और निर्मलता की प्राप्ति की थी। उनका ध्यान सदैव भगवान परमेश्वर में लगा रहता था। माता महागौरी की पूजा से भक्त उनकी पवित्रता, शांति, और निर्मलता का आदान-प्रदान करते हैं और उन्हें अपने जीवन में विशेष ध्यान देते हैं।

नवरात्रि के नौवें दिन की पूजा और कथा

दिनांक – 23 अक्टूबर 2023 

तिथि – आश्विन शुक्ल अष्टमी 

देवी – माँ सिद्धिदात्री 

मंत्र 

सिद्धगंधर्वयक्षाधैरसुरैस्मरैरपि | 

सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी || 

पूजन शुभ चौघड़िया मुहूर्त

नवरात्रि के नौवें दिन को “महानवमी” के नाम से जाना जाता है। यह नौवा दिन नवदुर्गा की नौवीं स्वरूप, व्याघ्रिणी या महिषासुरमर्दिनी, को समर्पित है। महानवमी के दिन मां दुर्गा की पूजा और आराधना की जाती है। इस दिन मां दुर्गा की कथा और उनका व्रत कार्यक्रम महत्वपूर्ण है। नौवें दिन की पूजा और कथा के विवरण निम्नलिखित है:

नवरात्रि के नौवें दिन की पूजा:

  • पूजा की शुरुआत: पूजा की शुरुआत में पात्र में पानी और कन्या के लिए सोने की कड़ाई में पानी रखें।
  • माता की मूर्ति: माता सिद्धिदात्री की मूर्ति को सजाकर उस पर रोली से तिलक लगाएं और मौली अर्पित करें।
  • पूजा अर्चना: माता को फूल, दीपक, अगरबत्ती, चावल, कुमकुम, और मिठाई के रूप में अर्चना करें।
  • आरती और भजन: माता की आरती गाएं और उनके लालन के भजन गाएं।
  • नैवेद्य: माता को फल, मिठाई, पूड़ी, और चना अर्पित करें।
  • प्रसाद वितरण: पूजा के बाद प्रसाद को सभी परिवार के सदस्यों को बाँटें।
  • माता की कथा: माता की कथा सुनाएं और भक्ति भाव से माता की पूजा करें।
  • व्रत का समापन: पूजा के बाद, नियमित रूप से इस व्रत को समापन करें और माता सिद्धिदात्री की कृपा और आशीर्वाद का आनंद लें।

माता सिद्धिदात्री की कथा:

माता सिद्धिदात्री की कथा के अनुसार, एक समय भगवान शिव ने उनकी तपस्या और साधना के परिणामस्वरूप माता सिद्धिदात्री को अपनी पत्नी बनाया था। माता सिद्धिदात्री की पूजा से भक्त उनकी सिद्धि, बुद्धि, और संपन्नता की प्राप्ति करते हैं। उन्होंने अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धि और समृद्धि प्रदान की है और उन्हें आत्मा की पूर्णता की प्राप्ति में मदद करती हैं। भक्त उनसे संपन्नता, सिद्धि, और समृद्धि की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

नवरात्री पूजा की आरती में आमतौर पर भगवती दुर्गा, लक्ष्मी, और सरस्वती की महिमा, महत्व, और आशीर्वाद की प्रशंसा की जाती है। यहाँ एक सामान्य नवरात्री पूजा की आरती दी जा रही है, जो आप पूजा के समय गाते हैं:

नवरात्री पूजा की आरती:

(१) जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवजी।
माँं जय अम्बे गौरी॥
माँं जय अम्बे गौरी॥

(२) माँं जग की दुर्गा, जगपलनि जय जय मा।
भवानी, जय, भवानी, अम्बे, जय जय मा॥
जय अम्बे गौरी॥

(३) मां जग की ज्योति, जगपलनी जय जय मा।
फूलों में रंगती चमकती माँ,
मां जय अम्बे गौरी॥

(४) शुमँगल बेला, अमंगल बेला।
ढूंढत निकट नहीं पवन में माँ।
मां जय अम्बे गौरी॥

(५) हरि ब्रह्मा शिवजी, उजियारी दरबारी।
माँं कहे फरमाई, बारी-बारी॥
माँं जय अम्बे गौरी॥

(६) शेर के सवारी, मां नैय्या तेरी।
संतन की सेवा, संतन की सेवा॥
माँं जय अम्बे गौरी॥

(७) माँं के द्वार पर हरिद्वार, बैठे संत प्यारे।
संतन की सेवा, संतन की सेवा॥
माँं जय अम्बे गौरी॥

(८) माँं जग की ज्योति, जगपलनी जय जय मा।
फूलों में रंगती चमकती माँ,
माँं जय अम्बे गौरी॥

(९) शेर के सवारी, मां नैय्या तेरी।
संतन की सेवा, संतन की सेवा॥
माँं जय अम्बे गौरी॥(१०) हम जनम लेंगे, हम मरने वाले हैं।
जीने की अरजू, हम मां तुमसे पाने हैं॥
मां जय अम्बे गौरी॥

इस आरती का पाठ करने से माता दुर्गा की कृपा, आशीर्वाद, और सुरक्षा प्राप्त होती है। यह आरती नवरात्रि के प्रति भक्ति भाव से गाई जाती है और भक्तों के दिल में श्रद्धा और भक्ति की भावना को उत्तेजित करती है।

नवरात्री व्रत का महत्व

एक समय की बात है, जब प्राचीन काल में देवताओं के गुरु बृहस्पति ने ब्रह्मा जी से पूछा – “हे परमपिता, चैत्र और आश्विन महीनों में मनाई जाने वाली नवरात्री पूजा का क्या महत्व है और इसे क्यों किया जाता है? साथ ही यह भी बताइए कि सबसे पहले नवरात्री पूजा और व्रत को किसने किया था।”

ब्रह्मा जी ने मुस्कान के साथ जवाब दिया, “हे देवगुरु, तुमने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। नवरात्रि पूजा का महत्व अत्यधिक है। यह पूजा देवी दुर्गा की प्रतिष्ठा का प्रतीक है और हमें उनकी शक्ति और साक्षात्कार की ओर ले जाती है।”

“नवरात्रि का व्रत और पूजा करने से भगवती का आशीर्वाद मिलता है। जो भक्त इसे समर्पित दिल से करता है, उसके घर में सुख, समृद्धि, और शांति की वातावरण बनी रहती है। रोग, दोष, और बीमारियों का नाश होता है। यह व्रत सभी पापों को दूर करता है।”

“नवरात्रि का व्रत रखने के लिए जरुरी नहीं है कि पूरे दिन का उपवास किया जाए। व्यक्ति 9 दिनों तक माता के 9 रूपों की पूजा करें और नवरात्रि व्रत की कथा सुनें। इससे माता दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और उसका जीवन समृद्ध, सुखमय, और शांति से भर जाता है।”

नवरात्री की व्रत कथा:

बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक ब्राह्मण ब्रह्मदत्त नामक विशेषज्ञ थे। वह बहुत ही भग्तिपूर्ण थे और हमेशा देवी दुर्गा की पूजा में लगे रहते थे। एक दिन, उन्होंने गहरी ध्यान में चले जाने के बाद देवी दुर्गा की आवाज सुनी।

देवी दुर्गा ने ब्रह्मदत्त से कहा, “हे भक्त, मैं तुम पर खुश हूँ और तुम्हारी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए मैं आगामी नवरात्रि में तुम्हें प्रसन्न करने का निर्देश देती हूँ।”

नवरात्रि के आने पर ब्रह्मदत्त ने तत्पर भाव से नवरात्रि की पूजा और व्रत का आयोजन किया। वह नौ दिन तक नियमित रूप से माता दुर्गा की पूजा करते रहे, अनहोनी से भी नहीं भटके। नवरात्रि के आखिरी दिन, जब वह पूजा कर रहे थे, देवी दुर्गा स्वयं प्रकट होकर प्रस्तुत हुईं।

देवी ने ब्रह्मदत्त से वरदान मांगने की अनुमति दी। ब्रह्मदत्त ने धन, समृद्धि, और सुख-शांति की प्रार्थना की। देवी दुर्गा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें विशेष आशीर्वाद दिया।

इस घटना का समापन होने पर, लोग ब्रह्मदत्त की श्रद्धा और भक्ति की प्रशंसा करते हुए उनके चरणों में प्रणाम किया। इस घटना से समझाया जाता है कि नवरात्रि की पूजा और व्रत से प्राप्त भक्ति, विशेष आशीर्वाद और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। इसलिए हर कोई नवरात्रि की पूजा और व्रत को समर्पित भाव से करता है, ताकि उसे माता दुर्गा की कृपा प्राप्त हो।

नवरात्रि पूजा के लिए पंडित जी की बुकिंग कैसे करें

आप निम्नलिखित कदमों का पालन करके पंडितजी की सेवाओं के लिए बुकिंग कर सकते हैं:

  • वेबसाइट (Website): पंडितजी की आधिकारिक वेबसाइट www.panditjeeonline.in पर जाएं। वहां आपको पूजा की विवरणी, कीमत, और अन्य जानकारी मिलेगी।
  • ईमेल (Email): आप उनके ईमेल पते info@panditjeeonline.in पर ईमेल भेजकर पूजा की तिथि, समय, और अन्य जानकारी की पुष्टि कर सकते हैं।
  • व्हाट्सएप नंबर (WhatsApp Number): आप उन्हें WhatsApp पर संपर्क करने के लिए +91 9662001600 पर संदेश भेज सकते हैं।

सेवा के सटीक समय, तारीख और विवरण के लिए हमारी ओर से पंडितजी आपसे संपर्क करेंगे। उनसे पूजा सामग्री और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी की पुष्टि कर लें.